गाँवों का भारत

Wednesday, December 14, 2011

शहर कब्बो रास न आईल



धुरि में लथेडाईल देहि 
चिकई अउर कबड्डी कै जोश 
गुल्ली डंडा कै टांड
आईस- पाईस कै 
छुपम छुपी वाला खेल
कहवा चलि गईल उ दिन
शायद दुरे जाके भी 
हमरे मन में आपन याद छोड़ी गईल 
रही रही के कसक जगावे खातिन ।

अमवा के बौर लागल डारी
बरबस खींच लेले मनवा के 
अपने टिकोरवा की ओरि
अउर मनवा दौड़ पड़ेला 
अमवा के बगिया की ओरे
जईसन बचपन में दीवाना रहल ।

अमरुदवा के डारी डारी 
खेलत लखनी अउर कलैया
खेतवा के मेडी मेडी दौड़त
संझवा के दौड़
कुछो नाहि भुलाईल 
सालन बाद भी शहर में रहि के 
शहर कब्बो रास न आईल ।